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इराक मात्र 1400 वर्ष पहले ईरान उर्फ आर्यवत का हिस्सा था । विक्रमादित्य के समय ही . मात्र 2000 साल पहले .

अगर आप गूगल पर नालंदा की बनावट देखेंगे , तो ठीक ऐसी लगेगी। लेकिन यह मेसोपेटामिया उर्फ इराक की सभ्यता है, जो आज इराक कहलाता है ।

 

इराक मात्र 1400 वर्ष पहले ईरान उर्फ आर्यवत का हिस्सा था । विक्रमादित्य के समय ही …. मात्र 2000 साल पहले ….

 

महाराजा विक्रमादित्य का सविस्तार वर्णन भविष्य पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है। विक्रमादित्य के बारे में प्राचीन अरब साहित्य में वर्णन मिलता है। उस वक्त उनका शासन अरब तक फैला था। दरअसल, विक्रमादित्य का शासन अरब और मिस्र तक फैला था और संपूर्ण धरती के लोग उनके नाम से परिचित थे।

 

इतिहासकारों के अनुसार उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य का राज्य भारतीय उपमहाद्वीप के अलावा ईरान, इराक और अरब में भी था। विक्रमादित्य की अरब विजय का वर्णन अरबी कवि जरहाम किनतोई ने अपनी पुस्तक ‘सायर-उल-ओकुल’ में किया है। पुराणों और अन्य इतिहास ग्रंथों के अनुसार यह पता चलता है कि अरब और मिस्र भी विक्रमादित्य के अधीन थे।

 

 

तुर्की के इस्ताम्बुल शहर की प्रसिद्ध लायब्रेरी मकतब-ए-सुल्तानिया में एक ऐतिहासिक ग्रंथ है ‘सायर-उल-ओकुल’। उसमें राजा विक्रमादित्य से संबंधित एक शिलालेख का उल्लेख है जिसमें कहा गया है कि ‘…वे लोग भाग्यशाली हैं, जो उस समय जन्मे और राजा विक्रम के राज्य में जीवन व्यतीत किया। वह बहुत ही दयालु, उदार और कर्तव्यनिष्ठ शासक था, जो हरेक व्यक्ति के कल्याण के बारे में सोचता था। …उसने अपने पवित्र धर्म को हमारे बीच फैलाया, अपने देश के सूर्य से भी तेज विद्वानों को इस देश में भेजा ताकि शिक्षा का उजाला फैल सके। इन विद्वानों और ज्ञाताओं ने हमें भगवान की उपस्थिति और सत्य के सही मार्ग के बारे में बताकर एक परोपकार किया है। ये तमाम विद्वान राजा विक्रमादित्य के निर्देश पर अपने धर्म की शिक्षा देने यहां आए…।’

 

नालंदा ओर पूर्वी भारत मे इस्लाम ने हिन्दू मंदिरो का विध्वंस इसी कारण किया था ।। क्यो की पूर्वी भारत और मिस्र की सभ्यता में कोई विसेष अंतर नही था ।। जो अंतर था, वह भी समय के कारण आया …

 

अगर नालंदा आदि आज रहते, तो इराक आदि के स्मारक देखकर हिन्दू पहचान जाते, की यह तो अपने ही है ।।

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